पवन के प्रकार : Types of winds

पवन के प्रकार : Types of winds – एक स्थान से एक निश्चित दिशा की ओर चलती हुई वायु को पवन कहते हैं। सम्पूर्ण विश्व में विभिन्न प्रकार की पवनें (Types of winds) पायी जाती है। पृथ्वी के धरातल पर वायुदाब की विषमताओं के कारण हवा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर प्रवाहित होती है। पवने धरातल पर वायुदाब में क्षेत्रीय विषमताओं के कारण चलती हैं।

ये सामान्यतः उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर चलती हैं। किंतु पृथ्वी की घूर्णन गति कारण पवन की दिशा में विक्षेप पैदा हो जाता है। इस विक्षेप बल की खोज कोरियॉलिस नामक विद्वान ने किया था अतः इसे कोरियॉलिस बल भी करते हैं।

पृथ्वी के घूर्णन गति के कारण अपकेंद्रीय बल की उत्पत्ति होती है। फेरल के नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्ध में पवन दाहिनी और दक्षिणी गोलार्ध में बाई ओर मुड़ जाती है। यह पृथ्वी के घूर्णन गति के कारण होता है।
वॉइस बैलेंस नियम के अनुसार यदि उत्तरी गोलार्ध में पीठ की तरफ से पवन चल रही हो तो उच्च वायुदाब दाहिनी और निम्न वायुदाब बाई तरफ होता है।

पवन के प्रकार : Types of winds

पवन को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है :-

स्थाई पवनें 

IMG 20200414 201336

1. प्रचलित पवन

उपोषण उच्च वायुदाब कटिबंध से भूमध्य रेखा निम्न वायुदाब कटिबंध की ओर चलने वाली पवनों को प्रचलित पवने कहते हैं। इसे सनातनी, स्थाई या ग्रहीय पवनें भी कहा जाता है। यह पवन वर्ष भर एक ही दिशा में चलती हैं। 

भूमध्य रेखा के दोनों तरफ 5 डिग्री अक्षांशो के मध्य उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र बनाता है जिससे हवाएं गर्म होकर ऊपर उठती हैं तथा घनीभूत होकर घनघोर वर्षा करती हैं। इन पवनों का सबसे अधिक विस्तार महासागरों पर हैं। भूमध्य रेखा के समीप ही डोलड्रम अथवा शांत पेटी होती है।

फ्लोर नामक विद्वान ने बताया है कि डोलड्रम की पेटी में अत्यंत धीमी गति से पश्चिम से पूर्व की ओर पवने चलती है। जिन्हें विसुवत रेखीय पछुआ पवन कहते हैं।

2.व्यापारिक पवन

दोनों गोलार्धों में उपोष्ण उच्च वायुदाब की पेटियां से भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब की तरफ पवनें चलती हैं। इनकी दिशा वर्षभर निश्चित रहती है। उत्तरी गोलार्ध में इनकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण पूर्व से उत्तर-पश्चिम होती है।

प्राचीन काल में व्यापारियों को पाल युक्त जहाजों के संचालन में इन पवनों से पर्याप्त सुविधा मिलती थी। इसीलिए इन पवनों को व्यापारिक पवनें कहते हैं। भूमध्य रेखा के पास दोनों तरफ से आने वाली व्यापारिक पवनों के आपस में टकराने से मूसलाधार वर्षा होती हैं।

3. पछुआ पवन

उपोषण उच्च वायुदाब की पेटियों से उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब बेटियों की ओर बहने वाली पवन को पछुआ पवन कहते हैं इनकी दिशा उत्तरी गोलार्ध में दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व तथा दक्षिणी गोलार्ध में उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व की ओर होती है।

पछुआ हवाओं की पेटी में चक्रवात की उपस्थिति के कारण मौसम अत्याधिक परिवर्तनशील होता है। यहां गर्म और आद्र पछुआ हवाएं ठंडी ध्रुवीय हवाओं से मिलती है। जिससे वाताग्रा बनता है। इन्हीं शीतोष्ण वाताग्रो के कारण चक्रवात की उत्पत्ति होती है। उत्तरी गोलार्ध में स्थल भाग की अधिकता के कारण पवन अवेवस्थित तरीके से पाई जाती हैं। ये पवने गर्म अक्षांशों से ठंडे अक्षांशों की ओर चलती हैं। उत्तरी गोलार्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्ध मे पछुआ पवने ज्यादा व्यवस्थित होती है।

4. ध्रुवीय पवन

ध्रुवीय उच्च वायुदाब से उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर चलने वाली पवन को ध्रुवीय पवन कहते हैं। उत्तरी गोलार्ध में इनकी दिशा उत्तर पूर्व तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण पूर्व होती है। ध्रुव से आने के कारण ये हवाएं बहुत ठंडी होते हैं। शुष्क होने के कारण इन हवाओं से वर्षा नहीं होती है। ध्रुवीय हवाएं पछुआ हवाओं से टकराकर शीत वाताग्र बनाती है। जिससे शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति होती है।

अस्थाई पवनें 

धरातल पर कुछ पवने मौसम बदलने के साथ-साथ दिशा भी बदल जाती है ऐसे पौधों को अस्थाई या समय पहले कहते हैं। जो निम्न है:-

मानसूनी पवन

मानसून शब्द मूल रूप से अरबी भाषा के मोशन शब्द से बना है जिसका तात्पर्य मौसम होता है। अरब सागर पर बहने वाली हवाओं को दर्शाने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया गया था। इसकी दिशा छह महा उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम और छह माह दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व रहती है।

मानसूनी पवनों के चलने का कारण जल और स्थल की भिन्नता है। तापमान की भिन्नता से वायुदाब में भिन्नता पाई जाती है। आधुनिक विचारधारा के अनुसार सिर्फ इतनी ही मान्यताएं काफी नहीं है। फ्लोन ने गतिक उत्पत्ति सिद्धांत पर आधारित तथ्यों को बताया है।

मानसूनी पवनों के प्रकार

शीतकालीन मानसून
यह स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। ये शुष्क और ठंडी हवाएं हैं। इनसे वर्षा नहीं होती है।

ग्रीष्मकालीन मानसून।
यह हवाएं समुद्र से स्थल की ओर चलते हैं। इन हवाओं में जलवाष्प की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है। स्थल पर पहुंचकर इनसे भारी वर्षा होती है। भारत में मानसूनी वर्षा होती है।

जलीय तथा स्थलीय समीर।

यह मुख्य रूप से समुद्र तटीय क्षेत्रों में चलती हैं। दिन के समय स्थल भाग जल भाग से जल्दी गर्म हो जाता है। जिससे स्थल पर निम्न वायुदाब तथा महासागरों पर उच्च वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है और सागरों से स्थल की तरफ हवाएं चलने लगती हैं। इसी को जलीय समीर कहते हैं। रात्रि काल में इसके विपरीत स्थल से समुद्र की ओर हवाएं चलती हैं। उसको स्थलीय समीर कहते हैं।

पर्वत और घाटी समीर।

पर्वत और घाटी के मध्य पवनो का चलना एक दैनिक क्रिया है। दिन के समय पर्वत की ढाल सूर्य के सीधे प्रभाव में होती है। जिससे घाटी ढालो की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाती हैं। जिससे वायु घाटी तल से पर्वतीय ढालों पर ऊपर की ओर प्रवाहित होने लगती हैं। इससे घाटी समीर कहते हैं। रात्रि के समय पर्वतीय ढाल पर भौमिक विकिरण द्वारा ऊष्मा का हास होता है। ढाल की ऊंचाइयों से ठंडी और सघन वायु नीचे घाटी की ओर उतरने लगती है। इसे पर्वतीय समीर करते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here