हिमनद द्वारा निर्मित स्थलाकृति : topography created by glaciers

हिमनद द्वारा निर्मित स्थलाकृति : topography created by glaciers – ऊंचे पर्वतीय भागों में हिमानी से निर्मित स्थलाकृतियों (topography created by glaciers) का पाया जाना स्वभाविक बात है। पर्वतीय भागो में प्राकृतिक बर्फ का विशाल बहाव जो स्थल क्षेत्रों पर एक बृहत नदी के समान फैले रहने के साथ-साथ निम्नभूमि की ओर मन्द गति से प्रवाहित होता है हिमनद या हिमानी कहलाते हैं। आर्थर होम्स के अनुसार ” वे हिम राशियाँ जो गुरुत्व बल के प्रभाव से हिमक्षेत्र, जहाँ उनकी उत्पत्ति होती है, से बाहर खिसक जाती हैं हिमनदी कहलाते है।”

topography created by glaciers

हिमनदों की प्रवाह गति निम्नलिखित चार बातों पर निर्भर करती है-

(1) सूर्य ताप के बढ़ने से हिम पिघलन,

(2) अत्यधिक शीतलता से पुनः हिमीभवन,

(3) हिमपात की मात्रा में वृद्धि से बर्फ की परत में विस्तार,

(4) वाष्पीकरण तथा उच्चताप के कारण हिम संकुचन,

हिमनद के प्रकार : Type of Glacier

आयतन और आकृतियों के अनुसार हिमनद निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं :

(i) पर्वतपदीय या गिरिपाद हिमनद (Picdmou Glacier)

(ii) महाद्वीपीय हिमनद (Continental Glacier )

(iii) घाटी हिमनद (Valley Glacier)

(i) पर्वतपदीय या गिरिपद हिमनद-

ये हिमनद ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों से उतर कर गीरीपद क्षेत्रों में फैले होते है। इनका विस्तार बहुत अधिक होता है। ऐसे हिमनद निचले प्रदेशों में बनते हैं और दो या अधिक हिम नदियाँ मिलकर एक विस्तृत रूप लेती है। अलास्का का मेला स्पिना, आयरलैंड की बेतना जोकुल, अण्टार्कटिका में दक्षिणी विक्टोरिया वाटर पवाइंट और विलसन पवाइंट हिमनद इसी वर्ग का है।

(ii) महाद्वीपीय हिमनद-

ये अत्यधिक विशाल आकार के होते है इनका विस्तार  महाद्वीपों में होता हैं। ये ध्रुवीय क्षेत्रों और आर्कटिक में अधिक मिलते हैं। ऐसे भागो में जलवायु अत्यन्त शीतल होती है तथा जिसके बहुत लम्बे-चौड़े क्षेत्रों पर हिम संचयन होता रहता है। अन्टार्कटिका तथा ग्रीनलैण्ड के हिमनद मुख्यरूप से महाद्वीपीय हिमनद हैं।

(iii) घाटी हिमनद-

ऐसे हिमनद नदी की पुरानी घाटियों में बहते है। इन्हें पर्वतीय हिमनद या अल्पाइन हिमनद भी कहते हैं। पर्वतीय भागो में हिम संचयन की बढ़ती हुई मात्रा के कारण बाहर की ओर को फैलती हुई हिम जिह्वा के नीचे की ओर को बहने लगती है, इसे घाटी हिमनद कहते हैं।

हिमनद के कार्य – Himnad ke karya

नदी की तरह हिमनद भी तीन तरह से अपरदन, परिवहन और निक्षेपण का कार्य हैं। हिमनद अपरदनात्मक कार्य के दौरान उत्पादन (Plucking), अपघषण (Abrasion) और प्रसापर्ण (Sweeping) की क्रिया करते है।

हिमानी अपरदन से निर्मित स्थलरूप : erosional topography created by glaciers

(i) सर्क-

हिमनद की घाटी में एक अर्ध गोलाकार गढ़ा होता है जो हिमपात के साथ जल के घर्षण के द्वारा बना होता है।देखने में आराम कुर्सी के समान प्रतीत होता है। सर्क के कारण हिमनद का ढाल तीव्र हो जाता है तथा घाटी में भी फैलाव होता है।

सर्क में मुख्यतः तीन भाग होता है:-

  1. शीर्ष दीवार
  2. बेसिन
  3. चौखटा

हिमशिखरों को फ्रांस में सर्क (Cirque), कारपेथियन में जानोगा (Zanoga), पिरेनीज में ओल (Oule), नॉर्वे में बोटन (Botan), वेल्स में स्विंम (Ciwm), जर्मनी में कारेन (Karen) तथा स्कॉटलैंड में कोरी (Corrie) कहा जाता है।

(ii) टार्न या गिरिताल-

सर्क के निचले भाग में अत्यधिक कटाव के कारण बड़े बड़े गड्ढे बन जाते हैं।  इन गड्ढों में जल भर जाता है। घाटी हिमनद द्वारा निर्मित ये छोटे आकार की झील अथवा ताल टार्न या गिरिताल कहलाती है। उदाहरणार्थ ब्रिटेन के इंगलिश झील प्रदेश की रेड टार्न या ब्ली वेरी टार्न। जब ये गड्ढे दैत्य सोपानों के पास या बर्फ गिरने से बनते हैं तो इन्हें पीटर नास्टर झील कहते हैं।

(ii) गिरिश्रृंग या होर्न-

Type of Glacier

किसी पहाड़ी के चारों तरफ कई सर्क बनने से पहाड़ी किसी पिरामिड की तरह दिखने लगती हैं तो उसे गिरिश्रृंग या होर्न कहते है । विश्व के विभिन्न भागों में इस प्रकार के उदाहरण देखने को मिलता है आल्पस क्षेत्र के पेटर होर्न और वेटर होर्न इसका मुख्य उदाहरण है।

(iv) अरेत या तीक्ष्ण कटक

जब किसी हिमानी चोटी के दोनों तरफ से हिमनद प्रवाहित होते हैं तो यह एक पतली दीवार की तरह हो जाती है। यह रचना कंघिनुमा दिखाई देती है। इसे अरेत या तीक्ष्ण कटक कहते हैं।

(v) श्रृंग पुच्छ-

Type of Glacier

हिम चादरों के विस्तार वाले प्रदेशों में विभिन्न प्रकार के टीले होते हैं। किसी आगे की ओर को बढ़ती हुई हिम चादर के मार्ग में कोई टीला अवस्थित होता है तब वह अपनी दिशा में स्थित अधिक कोमल शैलों को अपरदित होने से बचा देता है। जिससे वहां एक निम्न ढाल की आकृति बन जाती है। इसे श्रृंग (Crag) और मन्द ढाल वाले अवशिष्ट शैल को पुच्छ (Tail) कहते हैं। स्कॉटलैण्ड में क्लेक मेनन क्षेत्र का श्रृंग-पुच्छ प्रमुख उदाहरण है।

(vi) रॉश मूटोने व भेड-पीठ शैल-

जब ऊबड़-खाबड़ तथा अनियमित उच्चावचन वाले प्रदेश से हिमनद बहता है तो ऊंचे उठे शैलों को वह काट-छाँट तथा घिसकर छोटे व चिकने बना देती है। इस प्रकार की अपरदित भू-आकृतियों को गोलपीठ के कारण ही भेड-पीठ शैल (Sheep-Rocks) कहते हैं। आल्पस, हिमालय तथा रॉकी क्षेत्रों में रॉश मूटोने आकृतियाँ मिलती हैं।

(vii) नूनाटक-

बृहद हिम क्षेत्रों में ऊचे उठे टीले जो कि चारों तरफ से हिम चादरों से ढके होते हैं और चोटी का हिस्सा हिम रहित होता है नुनाटक कहलाता है।

(vii) हिम घाटियाँ-

नदी घाटियों में हिम के अनवरत घिसाव एवं कटाव से घाटियाँ चौड़ी हो जाती हैं तथा इनके किनारे खड़े ढाल वाले होते हैं। इन्हें ‘यू आकार की घाटी’ कहते हैं। संयुक्त राज्य अमरीका में स्थित योसेमाइट घाटी इसका प्रमुख (U) आकार की घाटी का एक प्रमुख उदाहरण है।

(ix) निलम्बी या लटकती घाटी-

मुख्य हिमनद की घाटी का तल सहायक हिमनदों की घाटियों के तल से अधिक नीचा हो जाने से सहायक हिमनद कि घाटी लटकी हुई से प्रतीत होती है। ऐसे घाटी को लटकाती या निलम्बी घाटी कहते हैं। स्विट्जरलैण्ड की लाटर ब्रुन और कैलीफोर्निया के सेयरानिवादा पर्वत की योसेमाइट घाटी प्रमुख ऐसी घटिया का उदाहरण है।

(x) फियोर्ड-

हिमनदी की घाटी का तल समुद्र तल से अधिक नीचे स्थित होने पर तथा वहाँ की बर्फ पिघलने से समुद्र का जल इस घाटी में प्रवेश कर जाता है और एक संकरी ऐश्चुअरी बन जाती है जिसे फियोर्ड कहते हैं। विद्वानों के अनुसार सागर तल से ऊपर निर्मित हुई गहरी हिमनदीय घाटियों के सागर जल में निमज्जन से फियोर्ड बनते हैं। नॉर्वे, ग्रीनलैण्ड, लेब्राडोर, अलास्का, चिली तथा न्यूजीलैण्ड के फियोर्ड प्रमुख है।

(xi) हिमनदीय सोपान-

Type of Glacier

हिमनद घाटियों में कठोर और मुलायम शैलों के कारण उनके तलों में सीढ़ियों के आकार की बहुत बड़ी-बड़ी स्थलाकृतियाँ बन जाती हैं जिन्हें हिमनदीय सोपान कहते हैं।

(xii) झील माला-

किसी हिमनदीय घाटी में बनी झीलों की एक ऐसी श्रृंखला जो प्रतिरोधी शैलों के द्वारा तथा हिमोढ़ीय निक्षेपों के द्वारा पृथक् होती है, झील माला कहलाती है।

हिमानी निक्षेपण से निर्मित स्थलाकृति : depositional topography created by glaciers

हिमनदी के निक्षेपात्मक कार्यों द्वारा निर्मित भू-आकृतियों में हिमोढ, ड्रमलिन,केम, हिम टोकरी, एस्कर, एस्कर और हिमानीकृत मैदान आदि शामिल हैं।

हिमोढ़-

हिमनदी द्वारा जो मलवा उसकी घाटी में जमा किया जाता है, उसे हिमोढ़ कहते हैं। हिमोढ़ के अन्तर्गत पत्थरों के टुकड़े, मिट्टी के ऊँचे जमाव व गोलाश्म मृत्तिका के ढेर शामिल हैं। निक्षेप के स्थान को ध्यान में रखते हुए हिमोढ़ पाँच प्रकार के होते हैं-

(1) हिमनद जब अपने आधार पर मलवे से अत्यधिक भारित होकर मलवे के कुछ भाग को अपने तल पर छोड़कर ऊपर से गुजर जाता है तो यह निक्षेप तलस्थ हिमोढ़ (Ground Moraine) कहलाता है।

(2) जब हिमनद घाटी के दोनों पाश्र्वों पर उस शैल मलवे को जमा करता है जो उस घाटी की दीवारों से और दोनों पाश्र्वों पर एकत्रित हुआ शैल मलवा पाश्र्विक हिमोढ़ (Lateral Moraine) कहलाता है।

(3) हिमनद द्वारा जब अपने साथ लाए मलवे की वक्राकार कटक जो पिघले हुए हिम के अन्तिम सिरे पर जमा होती है, उसे अन्तस्थ हिमोढ़ (Terminal Moraine) कहते हैं। जर्मनी, डेनमार्क और पोलैण्ड आदि देशों में अन्तस्थ हिमोढ़ देखे जा सकते हैं।

(4) दो समीपवर्ती घाटी हिमनदों के परस्पर मिलकर एक धारा बन जाने से इन दोनों के आसन पार्श्विक हिमोढ़ परस्पर मिल जाते हैं, तब उस मिले हुए हिमनद में एक मध्यवर्ती गहरी कटक बन जाती है, उसे मध्यस्थ हिमोढ़ (Medial Moraine) कहते हैं।

(5) जब किसी हिमनदी का अन्तिम छोर पिघलकर पीछे को सिकुड़ने लगता है जब वहाँ इधर-उधर बिखरा हुआ मलवा अवशिष्ट रह जाता है उसे प्रतिसारी हिमोढ़ (Recessional Moraine) कहते हैं।

ड्रमलिन (Drumlin)-Type of Glacier

हिमनदी द्वारा निर्मित गोलाश्म- मृत्तिका की एक लम्बी, चिकनी और अण्डाकार पहाड़ी जो किसी हिमनदित क्षेत्र में पायी जाती है ड्रमलिन कहते हैं।

केम (Kame)-

पिघलते हुए हिमनद के जल द्वारा निक्षेपित बालू और बजरी के अनियमित शंक्वाकार टीलों को केम कहते हैं।

केम वेदिका (Kame terraces)-

किसी घाटी पार्श्व के साथ-साथ बालू और बजरी से निर्मित एक वेदिका सदृश कटक जिसका निर्माण हिमनदी तथा घाटी पार्श्व के मध्य द्रोणी में बहने वाली सरिता द्वारा लाए पदार्थ के निक्षेपण से होता है, केम वेदिका कहलाती है।

हिमगर्त (Kettle)-

हिमनदीय जलोढ में एक वृत्ताकार निम्न क्षेत्र जो साधारणतः जल से भरा रहता है, हिमगर्त कहलाता है।

हिमटोकरी (Hummocks)

शैल मलवों के जमावों से निर्मित कम ऊँचे टीले हिम टोकरी या हमक कहलाते हैं। कनाडा और संयुक्त राज्य अमरीका में अनेक हिमगर्त और हिम टोकरियां मिलती हैं।

एस्कर (Esker)-

पर्वतीय भागों में हिमनद तथा उनसे निर्मित जल धाराओं में निक्षेपित बालू-बजरी के लम्बे एवं साप की भाँति टेढ़े-मेढ़े और दूर तक फैले टीले हिमनद मृदुकटक या एस्कर कहलाते हैं।

अवक्षेप मैदान-

अन्तिम हिमोढ़ के उपरान्त हिम जल अनेक धाराओं में विभाजित हो जाता है और बारीक कणों को बहा ले जाता है। स्थल मार्ग पर जमा करके जलोढ़पंख का निर्माण करता है। इस हिमानीकृत मैदान को अवक्षेप मैदान कहते हैं।

 

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