भारत में वनों के प्रकार : Types of Indian forest

भारत में वनों के प्रकार:  प्राकृतिक वनस्पति से अभिप्राय पौधों के उन समुदाय से हैं जो लंबे समय तक बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के उगते हैं। ऐसी वनस्पति वहां पाई जाने वाली मिट्टी और जलवायु से प्रभावित रहती है।

भौगोलिक दशाओ में पर्याप्त भिन्नता के कारण भारत में विभिन्न प्रकार के वन पाए जाते है। वनों के प्रकारों का निर्धारण वर्षा की मात्रा से संबंधित है। जिन क्षेत्रों में 200 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा होती है उन क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन अधिक मिलते हैं ये वन प्रकृति से सघन और इनमें वृक्षों की लंबाई अधिक होते हैं।

Indian forest map
Image source :- mapsofindia.com

100 से 200 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में मानसूनी या पतझड़ प्रकार के वन पाए जाते हैं। 50 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मरुस्थलीय वनस्पतियां उगती हैं। जिसमें झाड़ियां, कैक्टस और कांटेदार वनस्पतियां मुख्य हैं।

भारत के उत्तरी क्षेत्र अर्थात हिमालय श्रेणी में तथा पश्चिमी घाट के कुछ भागों में शीतोष्ण कटिबंधीय वनस्पति पाई जाती हैं। समुद्र तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव तथा राजस्थान के मरुस्थलीय भाग में कांटेदार वनस्पतियां उगती हैं।

भारत की वनस्पतियों पर वर्षा का सर्वाधिक प्रभाव होता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सदाबहार वन पाए जाते हैं। सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रों में पतझड़ तथा कम वर्षा वाले भागों में कटीली झाड़ियां उगती हैं।

भारत में वनों के प्रकार : Bharat me vano ke prakar

भौगोलिक दृष्टि से भारत में पाए जाने वाले वनों को निम्न प्रकार से विभाजित किया जा सकता है:-

उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन

जिन क्षेत्रों में औसत वार्षिक तापमान 22 डिग्री सेल्सियस तथा वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है वहां उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन उगते हैं। ये वन वर्ष भर हरे भरे रहते हैं, इसीलिए इन्हें सदाबहार वन कहते हैं। ऐसे वनों में वृक्षों की ऊंचाई 40 से 70 मीटर तक होती है। भारत के पूर्वी हिमालय, पश्चिमी घाट, असम अंडमान निकोबार दीप समूह आदि क्षेत्रों में ऐसे वन पाए जाते हैं। इन वनों में रबड़, नारियल, महोगनी, बाँस आदि के वृक्ष उगते हैं। भारत में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन लगभग 45 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं।

सदाबहार वनों की विशेषताएं:-

  • ये वन अत्यधिक घने होते हैं।
  • इन वनों के वृक्षों में अनेकता होती है।
  • इनकी लकड़ी कठोर तथा औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण होती है।
  • इन वनों में विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणी रहते हैं।
  • इन वनों के लकड़ी का दोहन कठिन कार्य है।
  • इन वनों का महत्व सीमित हैं।

भारतीय वनों के प्रकार Indian forest

उष्णकटिबंधीय मानसूनी या पतझड़ वन

इस प्रकार के वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां वर्षा 100 से 200 सेंटीमीटर तक होती है। भारत में अधिकतर इसी प्रकार के वन मिलते हैं। ये वन गर्मियों के प्रारंभ में अपनी पत्तियां गिरा देते हैं इसलिए इन्हें मानसूनी या पतझड़ वन कहते हैं। ऐसे वन भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा तथा पश्चिमी घाट के कुछ भागों में पाए जाते हैं।

इन वनों में मुख्य रूप से आम, जामुन, नीम, महुआ, शहतूत, शीशम, चंदन आदि के वृक्ष मिलते हैं। इन वनों की लकड़ी आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होती है, जो मुलायम, मजबूत और टिकाऊ होती है। भारत में लगभग 220 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इन वनों का विस्तार है।

मानसूनी वनों की विशेषताएं:-

  • ये वन कम घने होते हैं।
  • वृक्षों की लंबाई भी औसतन होती है।
  • इनमे वृक्षों में समानता पाई जाती है।
  • इनका आर्थिक महत्व अधिक होता है।
  • देश में सबसे अधिक इसी प्रकार के वन पाए जाते हैं।
  • इन वनों से लघु उद्योग के लिए कच्चा माल प्राप्त होता है।

उष्णकटिबंधीय घास के मैदान

जिन क्षेत्रों में वर्षा औसतन 50 से 100 सेंटीमीटर होती है वहां बड़े वृक्ष नहीं उग पाते है। ऐसे क्षेत्रों में लंबी घासें तथा झाड़ियां उगती हैं। भारत के शुष्क मैदानी भागों में इस प्रकार के घास के मैदान पाए जाते हैं। इस प्रकार के वन मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश तथा मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से छोटी झाड़ियां एंव घास मिलती हैं।

मरुस्थलीय वनस्पति।

50 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मरुस्थलीय प्रकार के वनस्पति उगती हैं। यहां की वनस्पति में कटीली झाड़ियां तथा मोटे छाल वाले पौधे उगते हैं। इन वनस्पतियों में पत्तों का अभाव होता है। जिससे वाष्पीकरण कम होता है। छाल मोटे होने के कारण गर्मी में ये अपनी रक्षा कर पाते हैं। ऐसे वनों में नागफनी, बबूल, आंवला, खजूर, तथा करील आदि के वृक्ष उगते हैं। भारत में मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भागों में पाए जाते हैं।

मैंग्रोव वन

इस प्रकार के वनों का सर्वाधिक विस्तार पश्चिम बंगाल के सुंदरवन का डेल्टा में पाई जाती है समुद्र के खारे जल से वृक्षों की लकड़ी कठोर हो जाती है इन वनों के लकड़ी का प्रयोग नाव बनाने में मुख्य रूप से किया जाता है इन वनों में पाए जाने वाले वृक्षों की छाल का प्रयोग चमड़ा पकाने तथा उन्हें रंगने में किया जाता है इन वनों में मुख्य रूप से सुंदरी मैनग्रोव नारियल गोरे निभा आदि वृक्ष हैं गंगा तथा ब्रह्मपुत्र के डेल्टा ई भाग में सुंदरी नामक वृक्ष पाए जाते हैं इसीलिए इस वन को सुंदरवन भी कहते हैं।

पर्वतीय वन

इन वनों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है:-

(i) पश्चिमी हिमालय के वन

इस प्रकार के वन जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में पाए जाते हैं। यहां 1500 मीटर की ऊंचाई तक सदाबहार वनस्पतियां पाई जाती हैं। 1500 से 2500 मीटर तक शीतोष्ण कटिबंधीय वन मिलते हैं। ऐसे वनों की वृक्षों में प्रतियां चौड़ी होती हैं। इनमे मुख्य रूप से देवदार मैंपल आदि के वृक्ष हैं। 2500 से 4500 मीटर की ऊंचाई तक कोणधारी वन पाए जाते हैं। इनमें फर, स्प्रूस, चीड़, ब्लू पाइन आदि के वृक्ष पाए जाते हैं।

इससे ऊपर 4500 से 4800 मीटर तक के क्षेत्रों में टुंड्रा प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। यहां घास, काई तथा लाइकेन आदि वनस्पतियां पाई जाती हैं। 4800 मीटर के ऊपर किसी भी प्रकार के वनस्पति का अभाव पाया जाता है क्योंकि यहां सदैव बर्फ जमी रहती हैं।

(ii) पूर्वी हिमालय के वन

पूर्वी हिमालय के तराई क्षेत्रों में 1500 मीटर तक की ऊंचाई तक सदाबहार वन जैसे साल, आम, सेमल, कदम इत्यादि के वृक्ष पाए जाते हैं। 1500 से 2700 मीटर तक की ऊंचाई तक वर्च, मेपल, मैगनोलिया तथा साल के वृक्ष पाए जाते हैं। 2700 से 3600 मीटर की ऊंचाई तक चीड़, देवदार आदि के वृक्ष पाए जाते हैं। जिनकी पत्तियां नुकीली तथा मोटी होती हैं। इससे अधिक ऊंचाई पर सिल्वर फॉर, जूनिपर, भोजपत्र, स्प्रूस आदि के वृक्ष पाए जाते हैं।

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