भारत में मिट्टी के प्रकार : Types of soil in india

भारत में मिट्टी के प्रकार : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने 1986 में भारत में पाई जाने वाली 8 प्रमुख तथा 27 गौण प्रकार के मिट्टियों की पहचान की थी जो निम्न है :-

भारत में मिट्टी के प्रकार : Bharat me mitti ke prakar

Indian map of soil
Image source :- mapsofindia.com

 जलोढ़ मिट्टी

यह भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण मृदा है। यह देश के लगभग संपूर्ण क्षेत्रफल के 43% भूभाग पर विस्तृत है। इस मिट्टी का निर्माण हिमालय तथा आसपास के क्षेत्रों से निकलने वाली सदा वाहिनी नदियों के द्वारा लाए गए अवसाद के निक्षेपण से हुआ है। यह मिट्टी राख जैसे भूरे या धूसर रंग की होती है।

प्राचीन जलोढ़ की अपेक्षा नवनिर्मित जलोढ़ अधिक उर्वर होते हैं। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में प्राचीन जलोढ़ को बांगर तथा नवीन जलोढ़ को खादर कहा जाता है। बांगर भूमि में कंकर तथा अशुद्ध कैल्शियम कार्बोनेट की ग्रंथियां पाई जाती है। इसके अलावा इसमें फास्फोरस तथा पोटाश अधिक मात्रा में परंतु नाइट्रोजन और मृतिका की मात्रा कम पायी जाती है।

खादर मृदा पर प्रतिवर्ष बाढ़ आने से एक नई परत जम जाती है। भारत की लगभग आधी जनसंख्या का भरण पोषण जलोढ़ मृदा के द्वारा कृषि कार्य से होता है। इस मृदा में खाद्यान्न फसलों के उत्पादन सर्वाधिक होता है। इस मृदा में धान, गेहूं, दलहन, तिलहन आदि खाद्यान्न फसलों की खेती होती है।

मिट्टी के प्रकार : Types of soil

लाल मिट्टी

यह मिट्टी भारत में लगभग 6.1 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फैली हुई है, जो देश का 18.6% भूभाग है। यह भारत में पाई जाने वाली दूसरी सर्वाधिक विशालतम मृदा प्रकार हैं। यह मिट्टी लाल पत्थर तथा परिवर्तित चट्टानों के टूटने फूटने से बनी है। यह मुख्य रूप से तमिलनाडु, छोटानागपुर के पठार, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश तथा महाराष्ट्र राज्यों में पाई जाती है।

इस मिट्टी का लाल रंग लोहे के ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण होता है। यह मिट्टी अम्लीय प्रकार की मिट्टी है। इस मिट्टी में सिंचाई के द्वारा मोटे अनाज, दाल तथा तिलहन की खेती होती है। इस मिट्टी में लोहे, एलुमिनियम तथा चुने का अंश अधिक पाया जाता है। इसमे मृतिका, नाइट्रोजन तथा फास्फोरस की कमी पाई जाती है।

काली मिट्टी

भारत में इस मिट्टी का विस्तार 5.46 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर है जो देश के 16.6% भूभाग है। यह देश का तृतीय विशालतम प्रकार की मिट्टी है। यह मिट्टी लावा के जमाव से बने चट्टानों के अपरदन से बनी हैं। भारत में महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में यह मिट्टी पाई जाती है। इसमें लोहा, मैग्नीशियम, चुना तथा एल्युमीनियम की मात्रा अधिक पाई जाती है किन्तु नाइट्रोजन फास्फोरस तथा जैविक पदार्थों की कमी होती है।

इस मिट्टी में जल धारण करने की क्षमता सर्वाधिक होती है। इस मिट्टी में जल रहने पर यह काफी चिपचिपी होती है किंतु सूखने पर इसमें मोटे दरार उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए इस मिट्टी को स्वतः जोताई वाली मिट्टी के नाम से भी जानते हैं। यह मिट्टी काफी उर्वरक होती है। इसमें कपास, दाल, फल, चना, सोयाबीन, तिलहन, मोटे अनाज आदि फसलों की खेती होती है।

लेटराइट मिट्टी

इस मिट्टी का विस्तार 1.26 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर है जो देश का 3.7% भूभाग है। इस मिट्टी का निर्माण पर्वतीय भाग में चट्टानों के टूटने फूटने से होता है। यह मुख्य रूप से असम, मध्य प्रदेश, सहयाद्री, पूर्वी घाट, राजमहल की पहाड़ियों, सतपुड़ा, विंध्य आदि क्षेत्रों में पाई जाती है। यह मिट्टी देखने में इट के समान होती है। यह भीगने पर बहुत ही कोमल तथा सूखने पर कठोर हो जाती हैं। इसमें लोहा तथा एलुमिनियम की अधिकता पाई जाती है तथा नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश की कमी होती है। यह मिट्टी अनुपजाऊ होती है किंतु उर्वरकों का प्रयोग करके इसमें चाय, कहवा, सिनकोना, काजू आदि फसलों का उत्पादन किया जाता है।

मरुस्थलीय मिट्टी

यह मिट्टी पश्चिमी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में पाई जाती है। इस मिट्टी का विस्तार देश के 1.4% भू भाग पर है जो 2 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फैला हुआ है। इस मिट्टी में जैविक पदार्थों तथा नाइट्रोजन की कमी और कैल्शियम कार्बोनेट की अधिकता होती है। इस मिट्टी में खनिज लवणों की मात्रा अधिक पाई जाती है किंतु ये जल में शीघ्र घुल कर नीचे चले जाते हैं। इस मिट्टी में जीवाश्म की कमी पाई जाती है। शुष्क और लवणीय होने के कारण इस मिट्टी का कृषि कार्यों में कम उपयोग हो पाता है। सिंचाई के द्वारा इनमें ज्वार, बाजरा, मोटे अनाज व सरसों आदि उगाया जाता है।

पर्वतीय मिट्टी

यह मिट्टी पर्वतीय ढालों पर प्रमुख रूप से पाई जाती है। इसे वनीय मिट्टी भी कहा जाता है। इसका विस्तार 2.85 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फैला हुआ है। भारत में मुख्य रूप से मध्य शिवालिक, हिमालय, पूर्वोत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में पहाड़ियों पर इस मृदा का विकास हुआ है। इसमें नाइट्रोजन तथा ह्यूमस की अधिकता है किंतु इसमें पोटाश, चुना और फास्फोरस का भाव होता है। यह अम्लीय स्वभाव की मिट्टी हैं। इस मिट्टी में चाय, सेब, केसर आदि की खेती की जाती है। कुछ भागों में चावल तथा आलू की भी खेती इस मिट्टी में की जाती है।

पीट या दलदली मिट्टी

यह मिट्टी अधिक वर्षा एवं उच्च आद्रता वाले क्षेत्र में पाई जाती है। इसमें लवण तथा जैविक पदार्थों की मात्र 40 से 50% तक पाई जाती है। पीट मिट्टी में पोटाश तथा फास्फोरस की कमी होती है। यह मृदा वनस्पतियों के सड़ने से निर्मित होती है। यह केरल तथा तमिलनाडु के आद्र प्रदेशों में मुख्य रूप से पाई जाती हैं। भारत के डेल्टाई क्षेत्रों तथा हिमालय की तराई प्रदेश में यह मिट्टी बहुलता से पाई जाती है। इस पर मैनग्रोव वनस्पतियों का विकास अधिक होता है।

लवणीय या क्षारीय मृदा

इस मिट्टी का विकास कोशिका क्रिया से धरातल पर लवणों की परत, सोडियम कैल्शियम तथा मैग्नीशियम आदि के जमा होने से होती है। इस मिट्टी को रेह, कल्लर, थुर, चोपन आदि स्थानीय नामों से भी जाना जाता है। यह मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र के शुष्क भागों में पाई जाती है। इसका विस्तार भारत के संपूर्ण क्षेत्रफल का 1.7 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर है। यह एक अनुपजाऊ मिट्टी है, जिसमे जिप्सम का प्रयोग करके इसको कृषि योग्य बनाया जा सकता है।

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