भारत की ऋतुएं : Seasons of India

भारत की ऋतुएं – Seasons of India : परम्परागत रूप से उतर भारत में द्विमासिक आधार पे छः ऋतुएं मानी गई हैं। जिसका आधार अपना अनुभव, तापमान, वर्षा, तथा अन्य मौसम के घटक है। लेकिन यह व्यवस्था दक्षिण भारत के ऋतुओं से मेल नहीं खाती है। दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत में ऋतु परिवर्तन अधिक होता है।

भारत की ऋतुयें – Seasons of India

(1) शीत ऋतु

(2) ग्रीष्म ऋतु

(3) वर्षा ऋतु

(4) शरद ऋतु

(1) शीत ऋतु

भारत में शीत ऋतु नवंबर के मध्य में प्रारंभ होती है। उत्तरी भारत में जनवरी और फरवरी महीना सर्वाधिक ठंडा महीना होता है। इस समय भारत के अधिकांश भागों में दैनिक तापमान 21 डिग्री सेल्सियस से कम रहता है। पंजाब और राजस्थान में तापमान कभी-कभी हिमांक से नीचे चला जाता है। तटीय भागों में तापमान का वितरण समरूप पाया जाता है। दक्षिण भारत में जनवरी के मध्य तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। पश्चिमी घाट की पहाड़ियों पर तापमान अपेक्षाकृत कम पाया जाता है।

22 दिसंबर के बाद सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में मकर रेखा पर सीधा चमकता है। इस समय भारत में मुख्य रूप से उच्च वायुदाब पाया जाता है। जनवरी-फरवरी महीने में भूमध्य सागर से आने वाले कुछ क्षीण शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात भारत के पश्चिमी भाग में अपना प्रभाव दिखाते हैं। इस समय हल्की वर्षा के साथ तापमान और कम हो जाता है। सर्दियों में भारत का मौसम बहुत सुहाना बना रहता है। भूमध्य सागर से आने वाले शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात पश्चिमी विक्षोभ के नाम से जाने जाते हैं।

शीत ऋतु में मानसूनी पवने स्थल से समुद्र की ओर चलते हैं जिसके कारण वर्षा नहीं होती है। इस समय वर्षा सिर्फ पश्चिमी विक्षोभ के कारण भारत के पश्चिमी भाग जैसे दिल्ली , हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होती है।

(2) ग्रीष्म ऋतु

इस ऋतु का विस्तार मुख्य रूप से मार्च से मध्य जून तक रहता है। 21 मार्च के बाद सूर्य कर्क रेखा की ओर बढ़ने लगता है जिससे भारत के तापमान में भी बढ़ोतरी होती है। अप्रैल, मई तथा जून में मुख्य रूप से ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव रहता है। इस समय भारत के अधिकांश भागों में औसत तापमान 30 से 32 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। मध्य प्रदेश तथा गुजरात में तापमान बढ़कर 38 से 43 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है। मई में ताप पेटी उत्तर की ओर खिसक जाती है जिससे उत्तर पश्चिमी भागों में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस के आसपास तक पहुंच जाता है।

दक्षिण भारत में तापमान उत्तर भारत की तरह प्रखर नहीं होता। यहां तापमान 26 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहता है जिसका मुख्य कारण समुद्र तटीय प्रभाव है।

ग्रीष्म ऋतु में भारत के अधिकतर भागों में वायुदाब निम्न पाया जाता है। इस समय उत्तरी भाग में दोपहर के बाद “लू” नामक विख्यात शुष्क तथा तप्त हवाएं चलती हैं। जिसका प्रभाव मध्य रात्रि तक बना रहता है। पंजाब राजस्थान तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में धूल भरी आंधी चलती है।

यह अस्थाई तूफान भीषण गर्मी से कुछ राहत दिलाते हैं क्योंकि यह अपने साथ हल्की बारिश और शीतल हवाएं लाते हैं। इस ऋतु में वार्षिक वर्षा का सिर्फ 10% भाग प्राप्त होता है। इस ऋतु में स्थानीय स्तर पर तेज तूफान पैदा होते हैं जिनका वेग 100 से 125 किलोमीटर प्रति घंटा तक रहता है। स्थानीय तूफानों से तेज हवाओ के साथ मूसलाधार वर्षा होती हैं। बंगाल में इन्हें काल बैसाखी के नाम से जानते हैं।

(3) वर्षा ऋतु

वर्षा ऋतु का आगमन मध्य जून से आरंभ होता है तथा इसकी समाप्ति मध्य सितंबर तक होती है। इस ऋतु के साथ भारत में दक्षिण पश्चिम मानसून का आगमन होता है। इस समय उत्तर पश्चिमी मैदानों में तापमान में तेजी से बढ़ोतरी होती हैं जिससे निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है। ये हिंद महासागर से आने वाली दक्षिणी पश्चिम व्यापारी पवनो को आकर्षित करते हैं।

हिंद महासागर से दक्षिणी गोलार्ध की तरफ से आने वाली हवाएं उत्तरी गोलार्ध में पहुंचकर फेरल के नियमानुसार अपने दाहिने मुड़ जाती हैं। जिससे 1 जून को भारत के दक्षिणतम भाग में अचानक वर्षा शुरू हो जाती है। इसे ही मानसून का धमाका कहते हैं। भारत में दक्षिण पश्चिम मानसून से 90% से अधिक वर्षा प्राप्त होते हैं।

भारतीय मानसून के मुख्य रूप से दो शाखाएं हैं:-

बंगाल की खाड़ी की शाखा –

इस शाखा से देश का पूर्वी भारत तथा मध्य उत्तरी भारत प्रभावित होता है। बंगाल की खाड़ी का मानसून भारत में गारो, खासी, जयंतिया आदि पहाड़ियों से टकराकर सर्वाधिक वर्षा करता है। यहां मेघालय में स्थित मासिनराम में वर्षा औसतन 1405 सेंटीमीटर होती है। पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा कम होती चली जाती है।

अरब सागर की शाखा :-

यह मुख्य रूप से अरब सागर में पैदा होता है। इस शाखा से भारत का पश्चिमी तट तथा दक्षिण मध्यवर्ती भाग प्रभावित होता है । पश्चिमी घाट से टकराकर इसके द्वारा 200 से 400 सेंटीमीटर तक वर्षा होती है।

(4) शरद ऋतु

भारत में शरद ऋतु मध्य सितंबर से मध्य नवम्बर तक रहता है सितम्बर के अंत में सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण गंगा के मैदान पर स्थित निम्न वायुदाब की पेटी दक्षिण की ओर खिसकना आरम्भ कर देती है। जिससे भारत के उत्तरी भाग में दक्षिण-पश्चिमी मानसून कमजोर पड़ने लगता है। मानसून सिंतबर महीने के अंत में राजस्थान, गुजरात, पश्चमी गंगा मैदान तथा मध्यवर्ती उच्च भूमियों से लौट चुका होता है। अक्टूबर में बंगाल की खाड़ी के उत्तरी भागों में स्थिर हो जाता है तथा नवंबर के शुरू में यह कर्नाटक और तमिलनाडु की ओर बढ़ जाता है। इसीलिए इसे मानसून प्रत्यावर्तन अर्थात् मानसून के लौटने की ऋतु भी कहते हैं।

देश के सुदूर दक्षिणी भागों में मानसून प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया दिसम्बर तक जारी रहती है। मानसून के निवर्तन की ऋतु में आकाश स्वच्छ हो जाता है और तापमान बढ़ने लगता है। जमीन में अभी भी नमी होती है। उच्च तापमान और आर्द्रता की दशाओं से मौसम कष्टकारी हो जाता है । आमतौर पर इसे ‘कार्तिक मास की ऊष्मा’ कहा जाता है।

अक्टूबर माह के उत्तरार्ध में तापमान तेजी से गिरने लगता है। तापमान में यह गिरावट उत्तरी भारत में विशेष तौर पर देखी जाती है। मानसून निवर्तन की ऋतु में मौसम उत्तरी भारत में सूखा होता है, जबकि प्रायद्वीप के पूर्वी भागों में वर्षा होती है । यहाँ अक्टूबर और नवंबर वर्ष के सबसे अधिक वर्षा वाले महीने होते हैं। इस ऋतु की व्यापक वर्षा का संबंध चक्रवातीय अवदाबों के मार्गों से है, जो अंडमान समुद्र में पैदा होते हैं। और दक्षिणी प्रायद्वीप के पूर्वी तट को पार करते हैं । ये उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात अत्यंत विनाशकारी होते हैं।

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